चुन्नी और लीला
पहले पुराना हिसाब चुकता करो । अब मैं तुम्हें ओर पैसे नहीं दे सकता , साहूकार ने चुन्नीलाल से कहा ।
चुन्नीलाल : आप तो साहूकार है , बहुत पैसे है आपके पास तो। मुझे कुछ रुपए ओर दे देंगे तो आपका तो कुछ नहीं बिगड़ेगा पर मेरे घरवालो का पेट भर जाएगा ।
साहूकार : मैं यहाँ तुम्हारे घर वालों का पेट भरने का ठेका लेके नहीं बैठा हूँ । चुप चाप पुराना हिसाब दो ओर चलता बनो ।
चुन्नीलाल : मेरे पास पैसे नहीं है , मैं बातों को घूमना नहीं जानता ओर आपके पास कुछ पैसे ओर लेने आया हूँ । अब या तो मुझे पैसे दे दो या फिर कुछ खाने को हि दे दो ताकी मैं घर वालो का पेट भर सकूँ ।
साहूकार : मैं अब परेशान हो गया हूँ तुमसे चुन्नीलाल । छोटू इसे ओर इसके घर वालो के लिए कुछ खाने को दे दो । छोटू खाना पैक कर के चुन्नीलाल को देता है ।
चुन्नीलाल : धन्यवाद । भगवान तुम्हें ख़ुश रखें ।
ये ग़रीबी भी ख़तरनाक होती है , भगवान मुझे कभी एसा दिन ना दिखाना साहूकार ने मन में सोचा ।
ये लो आज का खाना । पेट भर के खाओ । गर्म ओर स्वादिष्ट है ।
लीला ( चुन्नी कि पत्नी) : ये कहा से मिला ?
चुन्नी: साहूकार ने पैसे देने से इंकार कर दिया ओर पुराना हिसाब माँगने लगा । मैंने कहा मेरे पास पैसे नहीं है ओर घर वाले भूखे है पैसे ना सही कुछ खाने को हि दे दो । चलो अच्छा हि है ना अगर साहूकार पैसे देता तो वापस माँगता ओर खाना तो कोई वापस नाहीं माँगता ना है ।
लीला : हुह ! क्या फ़र्क़ पड़ जाता जो कुछ पैसे दे देता तो । ओर तुम क्या बार बार साहूकार साहूकार कर रहे हो , हैं तो रिश्तेदार । तुम्हारा चचेरा भाई है काहे का साहूकार ।
चुन्नी: लीला ये एसा बोलना ओर सोचना ग़लत है रिश्तेदारी अपनी जगह ओर साहूकारी अपनी जगह । ओर अगर तुम मुझे शहर जाने दो तो सब ठीक हो जाएगा । मैं वहाँ कोई भी काम कर के हम सब का पेट भर सकता हूँ। हम लोहार है किसी भी लोहार कीं दुकान में काम करूँगा तो ज़रूर वे लोग खुश होंगे क्योंकि मेरे जैसा लोहे का काम कोई कर ही नहीं सकता । बस यहाँ गाँव में लोग सहीं मोल नहीं दे पाते परंतु शहर मैं सही मोल मिलेगा ।
लीला : मेरी तो परवाह हि किसे है , शहर जाओगे तो पीछे हम अकेले कैसे रहेंगे । ओर जाना है तो हमें साथ ले चलो ।
चुन्नी : साथ में चलोगे तो रहोगे कहा ,सिर्फ़ एक महीने कीं बात है फिर मैं सबको ले चलूँगा ओर हज़ार बार तुम्हें समझा चुका हूँ । ज़िद करने से कोई लाभ नही है ।
लीला: फ़ालतू बकवास नहीं करो , ओर तुम्हें मुझसे कहा कोई हमदर्दी है ।
चुन्नी : ठीक है नहीं जाता ।
लीला: मेरे नाम का बिल ना फाड़ो ।जाना है तो जाओ तुम कहा मेरी सुनते हो ।
चुनी इस स्वभाव से तंग आ चुका था । चुन्नी ने सोचा कि एक बारे सबको साथ लेके ही गाँव चला जाए । ओर वे सब रेल्वे स्टेशन गए । चुन्नी ने खिड़की में पूछा कि भैया शहर कि लोकल कब आएगी ?
लीला: लोकल क्यू ? इक्स्प्रेस पूछो लोकल मैं समय बहुत लगता है । चुन्नी चुप रहा । लीला ग़ुस्से से आगबबूला हो रही थी । दोनो बच्चे समझ नहीं रहे थे कि क्या करे । उन्हें लग रहा था कि पिताजी माँ को ग़ुस्सा दिलाते है ओर वे मन ही मन पिताजी से घृणा करने लगे ।
चुन्नी ये सब बात नहीं जानता था । उनके पास पैसे नहीं थे ओर लोकल में टीटी बहुत कम आते है इसलिए वह लोकल में जाना चाहता था बिना टिकट , लेकिन एक्षप्रेस मैं टीटी नियमित आता है ओर अगर बिना टिकट गए तो पकड़ें जाएँगे ।
चुन्नी: लो चलो इक्स्प्रेस में ओर क्या ?
लीला: सुना क्यूँ रहे हो कि इक्स्प्रेस में चल रहें है , लोकल में ही चलो मुझे क्या ?
चुन्नी : तो फिर क्यूँ मुँह फूलाती हो ?
लीला : ओह में मुँह फूलाती हूँ , अभी तक कभी फुलाया नहीं है , जब फुलाऊँगी तो पता चल जाएगा .
चुन्नी : अब जाना किसमें हाँ ? बोल दो
लीला( ज़ोर से ) :मैं तो परेशान हो गयी ।कितना ध्यान रखु ।
चुन्नी : इक्स्प्रेस में चलो ।
लीला: अगर आपको लोकल में जाना है तो चलो ।
चुन्नी : हाँ ठीक है तो लोकल में चलते है ।
लीला : देखा ! जाना लोकल में ही था इसीलिए तो चुपचाप बात मान ली.
चुन्नी : मैं हर बात तो मान ही लेता हूँ , वो भी चुप चाप .
लीला: ओहो ! मैं आपको अपनी बाते मनवाती हूँ, बुरी हूँ एसा बोलना चाहते हो ?
चुन्नी : माफ़ करो । ओर लोकल की ओर बढ़े ।
वे शहर पहुँचे। चुन्नी को शहर के मशहूर लोहार कालिया का कारख़ाना मालूम था । चुन्नी ने मन में सोचा कि यदि अकेला जाएगा तो लीला साथ जाने कि ज़िद्द करेगी इसलिए उसने कहा चलो मेरे साथ कालिया के कारख़ाने पे।
लीला : हम क्यूँ आए । आप जाओ ।
चुन्नी अकेला गया ओर कालिया से मिला ओर बोला : भाई साहब मुझे काम पर रखे ले , मैं गाँव से अभी आया हूँ ओर काम कि जरुरत है मैं एक अच्छा कारीगर हूँ चाहे तो आज काम करवा करे देख लीजिए ।
कालिया ने सोचा काम करवा कर देख लेते है क्या फ़र्क़ पड़ेगा ।
ठीक है ये लो हथोडा ओर काम चालू करो
चुन्नी ने एक ही घंटे में लोहे को आकार दे दिया ओर वो भी पूरी फ़िनिशिंग के साथ ।
अद्भुत मित्र ! तुमने ये कैसे किया । इतना कम करने मै मुझे पूरा दिन लगता है ।
चुन्नी : मै तो एक छोटा सा कारीगर हूँ , अगर आपको मेरा काम पसंद आया है तो मुझे काम पर रख ले ओर कुछ पैसे उदार दे दे ताकि मैं मेरे परिवार वाले जो रेल्वे स्टेशन पर बैठे है उनके लिए भोजन ले जा सकूँ.
कालिया: तो तुम उन्हें भी यहाँ ले के आओ । मेरे कारख़ाने में रात को चोरियाँ बहुत होती है यदी तुम यहाँ रहोगे तो शायद चोरियाँ ना हो।
अपका बहुत बहुत धन्यवाद ।
चुन्नी स्टेशन जाता है ओर लीला को सब बताता है ।
लीला: पैसे कितने देगा ये पूछा ? मै मुफ़्त में क्यूँ कारख़ाने का ध्यान रखु?
चुन्नी : हमें मुफ़्त मै रहने की जगह मिली है ओर तुम क्या बोल रही हो ?
लीला: मुझे क्या है ! फ़िक्र होती तो एसा काम कभी ना करते । ओर कारख़ाने की ओर निकले ।
चुन्नी मन ही मन बहुत उदास था उसकी पत्नी के इस स्वभाव परंतु क्या कर सकता था ।
कुछ महीने बीत गए कालिया का काम बहुत बढ़ गया ओर उसने चुन्नी कि पगार भी बढ़ा दीं । अब सब सुख हो गया। लीला वैसी की वैसी है परंतु अब दलरोटी कि चिंता नहीं है। चुन्नी ने साहूकार का उदार भी चुका दिया ।
जीवन समस्याओं से भरपूर सबका होता है। हमे सिर्फ़ हमारे कर्तव्य पर ध्यान देना चाहिए। तकलीफ़ें सबको होती हुए है बस जो अपना धर्म निभाता रहता है उससे राहत मिलती है ।
Once again 👌 sir
ReplyDeleteNice
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